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भारतीय परंपरा में सुबह जल्दी उठने की महिमा गायी हुयी हैं। इसको अमृत वेला, ब्रह्म मुहूर्त जैसे नामो से इसको सुशोभित भी किया गया हैं। रात को जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने से स्वास्थ्य की रक्षा तो होती ही हैं इसके साथ मानसिक शान्ति और संतुलन भी बना रहता हैं। आइये जाने सुबह जल्दी उठने के लिए क्यों कहा हैं आयुर्वेद में।

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एक कहावत हैं-

“तीन बजे जागे सुयोगी, चार बजे जागे सुसंत।
पांच बजे जागे सो महात्मा, छः बजे जागे सो भगत।
बाकी सब ठगत।।”

ऋग्वेद में कहा गया हैं “प्राता रत्नं प्रातरित्वा दधाति” अर्थात ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति रत्नो को धारण करता हैं।

इंग्लिश  (आंग्ल) भाषा में भी एक कहावत भी हैं “अर्ली तो बेड, एंड अर्ली तो राइज, मेकस अ मैन हेल्दी वेल्दी एंड वाइज”।

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सवेरे जल्दी उठने के निरंतर अभ्यास से व्यक्ति रोग एवं जरा (बुढ़ापे) से मुक्त होकर तथा रसायनवत लाभ प्राप्त करता हुआ शतायु होता हैं। ब्रह्म मुहूर्त में तम एवं रजोगुण की मात्रा बहुत कम होती हैं तथा सत्वगुण का प्राधान्य होता हैं, इसलिए इस काल में मानसिक वृतिया भी सात्विक और शांत हो जाती हैं।

brahma muhurta

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर अध्ययन करने वाले विद्यार्थी अधिक मेधावी स्वस्थ चैतन्य एवं नवजीवन से परिपूर्ण होते हैं। माता पिता को चाहिए के बच्चो को टी वी देखने इत्यादि किसी भी कारण से देर रात तक जागने से रोका जाये। यदि माता पिता स्वयं रात्रि में जल्दी सोते हैं और ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते हैं तो निश्चित ही बच्चो पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और वे भी उनका अनुसरण करेंगे।

आयुर्वेद के अनुसार प्रात: काल की वायु में अमृत कण विद्यमान  रहते हैं। रात्रि में चन्द्रमा की किरणों के साथ जो अमृत बरसता हैं, प्रात: काल की वायु उसी अमृत को साथ लेकर मंद मंद बहती हैं। यह वायु “वीरवायु” कहलाती हैं। जब यही अमृतमयी वायु हमारे शरीर को स्पर्श करती हैं, तब हमारे शरीर में तेज़ ओज बल शक्ति स्फूर्ति एवं मेधा का संचार होता हैं , चेहरे पर दीप्ती आने लगती हैं। चित की प्रफुल्लता बढ़ती हैं तथा शरीर उत्तरोत्तर स्वस्थ सबल बनता हैं रक्त की शुद्धि होती हैं। इसके विपरीत देर रात तक जागने से और देर सुबह तक सोने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का नुक्सान होता हैं।

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क्या हैं ब्रह्म मुहूर्त

रत्नावली नामक ग्रन्थ में रात्रि के अंतिम याम को, सकन्द पुराण में रात्रि के अंतिम आधे याम को ब्रह्म मुहूर्त कहा गया हैं।

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वैज्ञानिक दृष्टिकोण

अवार्चीन चिकित्सा अनुसंधानों के अनुसार प्रात: काल तीन बजे से पांच बजे पियूष (पिट्यूटरी) तथा पिनियल ग्रंथियों से अंत: स्त्राव विशेष स्त्रावित होते हैं, जिनका हमारे शरीर पर अमृत के जैसा ही प्रभाव रहता हैं। ये अंत: स्त्राव शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता का अभिवर्धन करते हैं तथा स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाले होते हैं।

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