मिर्गी को लेकर अभी भी देश में भ्रांतियां फैली हुई हैं। खासकर गांवों में मिर्गी को भूत-प्रेत के साये से जोड़कर देखा जाता है। यानी मरीजों का डॉक्टर से इलाज न कराकर झाड़-फूंक कराई जाती है। जोधपुर के न्यूरो सर्जन डॉ. नगेन्द्र इसे लेकर 18 साल से एक मुहिम छेड़े हुए हैं। वे न सिर्फ लोगों को जागरूक कर रहे हैं, बल्कि कैम्प लगाकर फ्री में मरीजों का इलाज भी करते हैं। अब तक वे 233 शिविर लगाकर 60 हजार मरीजों का इलाज कर चुके हैं। इन शिविरों में अब तक करीब पांच करोड़ रुपए की दवाएं फ्री में बांटी जा चुकी हैं। जानें कैसे हुई शुरुआत..

-डॉ. नगेन्द्र बताते है कि दिसंबर,1998 कोई गांववाला अपने बेटे को लेकर उनके पास इलाज कराने आया था। बेटे की बीमारी से वो परिवार इतना दु:खी था कि, उसके मरने की कामना करने लगा था। बस इसी बात ने उन्हें भावुक कर दिया। तब से उन्होंने फ्री में इलाज करना शुरू कर दिया।

ऐसे निकलता है खर्चा

-शिविर के लिए फ्री में दवाएं जुटाना एक चुनौती थी। डॉ. शर्मा ने उनके पास आने वाले मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स से प्रॉमिस लिया कि वे कंपनियों से सेम्पल नहीं लेंगे। इसके बदले शिविर के लिए दवाएं मुहैया कराई जाएं।

-हालांकि शुरुआत में फॉर्मास्यूटिकल्स कंपनियों को उनका सुझाव समझ नहीं आया, लेकिन बाद में एक-एक करके करीब दर्जनभर कंपनियां उनके साथ हो लीं।

-अब डॉ. शर्मा की इस मुहिम में 24 कंपनियां जुड़ी हुई हैं। हर महीने करीब 3 लाख रुपए की दवाइयां फ्री में बांटी जाती हैं।

कई पीड़ितों की शादी भी कराई..

-मिर्गी पीड़ितों की शादी में तमाम अड़चने आती हैं, डॉ. शर्मा इसे लेकर भी आगे आए। वे शिविरों के जरिये ही मिर्गी पीड़ितों के रिश्ते तय करा देते हैं।

-डॉ. शर्मा के मुताबिक, कुछ साल पहले एक लड़की और लड़का उनके पास मिर्गी का इलाज कराने आते थे। दोनों के बीच प्यार हुआ, लेकिन उनके परिजन जातिवाद के चलते शादी के राजी नहीं हुए। तब वे खुद आगे आए और दोनों के परिवार को समझाया।

-डॉ. शर्मा के अनुसार, इनकी शादी हुई। इनकी एक बेटी है। वहीं अब ये दोनों पूरी तरह ठीक हो चुके हैं।

800 से ज्यादा मिर्गी पीड़ित महिलाओं की डिलेवरी कराई

-मिर्गी पीड़ित महिलाओं की डिलेवरी कराने से कई बार डॉक्टर तक हाथ खड़े कर देते हैं। इसे देखते हुए डॉ. नगेन्द्र ने अपने हॉस्पिटल में यह फ्री में यह सुविधा मुहैया कराई।

– अब तक उनके हॉस्पिटल में 800 से ज्यादा सुरक्षित डिलेवरी हो चुकी हैं।

-शुरुआत में डॉ. नगेन्द्र स्वयं सरकारी अस्पताल में डिलेवरी के समय मौजूद रहे। उन्हें देखकर दूसरे डॉक्टरों में भी कान्फिडेंस बढ़ा और वे भी इस काम में आगे आए।

-डॉ. नगेंद्र मिर्गी पीड़ित बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में भी आगे आए हैं। दरअसल, पीड़ित बच्चों को परिवारवाले स्कूल भेजने से डरते हैं। डॉ. नगेंद्र ऐसे लोगों को समझाते हैं। वे अब तक 300 से ज्यादा बच्चों को दुबारा स्कूल भेज चुके हैं।

– डॉ. नगेन्द्र बताते है कि वर्ष 1998 के दिसम्बर माह में एक ग्रामीण मिर्गी रोग से पीड़ित अपने पुत्र को लेकर इलाज के लिए उनके पास आया। पुत्र की बीमारी से त्रस्त उस ग्रामीण ने कहा कि यह बच्चा मर जाए तो बेहतर होगा। ताकि इसे मिर्गी से निजात मिल जाए। उसका कहना था कि मिर्गी का इलाज काफी लम्बा और महंगा है। वहीं सालभर में एक और बच्चा पैदा हो जाएगा। ग्रामीण की इस सोच ने डॉ. नगेन्द्र को व्यथित कर दिया। उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि ग्रामीण क्षेत्र में मिर्गी से पीड़ित लोगों का निशुल्क इलाज शुरू किया जाए ताकि लोगों को राहत मिल सके।

ऐसे निकलता है खर्चा

– डॉ. शर्मा ने विचार तो कर लिया, लेकिन इलाज की महंगी दवाइयों की व्यवस्था करना सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न उनके सामने था। इस पर डॉ. नगेन्द्र ने मिर्गी रोग की दवा बनाने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों से वार्ता की।

– उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वे अपनी कंपनी की दवा की बिक्री के लिए चिकित्सक को फ्री सेम्पल भी देते है। डॉ. नगेन्द्र ने उनसे कहा कि वे इसे नहीं लेंगे। इसके बदले में कंपनियां उनके मरीजों को निशुल्क दवा उपलब्ध करवा दे।

– दवा कंपनियों को शुरुआत में कुछ समझ नहीं आया। बाद में वे इसके लिए तैयार हो गई। शुरुआत में बारह दवा कंपनियों की सेवा ली गई। प्रत्येक दवा कंपनी एक माह में आने वाले मरीजों के लिए निशुल्क दवा उपलब्ध कराना शुरू कर दिया।

– शुरू के शिविरों में जानकारी के अभाव में महज साठ मरीज ही आए। बाद में प्रचार-प्रसार के कारण लोगों को जानकारी मिलना शुरू हुई तो इनकी संख्या बढ़कर सवा सौ तक जा पहुंची।

– धीरे-धीरे मरीजों की संख्या बढ़कर तीन सौ से पार चली गई। इस पर डॉ. नगेन्द्र ने बारह दवा कंपनियों को अपने इस काम से जोड़ लिया। अब कुल २४ दवा कंपनियां मिलकर हर माह ढाई से तीन लाख रुपए की दवाइयां डॉ. नगेन्द्र के मरीजों को निशुल्क दवा उपलब्ध करवा रही है।

करा दिए कई पीड़ितों के विवाह

– समाज में व्याप्त भ्रांतियों के चलते मिर्गी रोगियों का विवाह आसानी से नहीं होता। कोई भी व्यक्ति ऐसे मरीजों के साथ रिश्ता जोड़ना नहीं चाहता। ऐसे में डॉ. नगेन्द्र की ओर से लगाए जाने वाले शिविर इस तरह विवाह को तरस रहे लोगों के लिए मिलन स्थल बन गए।

– सबसे पहले जोधपुर शहर के एक युवक व युवती की मुलाकात हुई। दोनों में पहले प्यार हुआ और बात शादी तक जा पहुंची। लेकिन जाति अलग होने के कारण दोनों के घरवाले इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हुए।

– ऐसे में डॉ.नगेन्द्र ने पहल कर दोनों पक्षों से मुलाकात कर इस रिश्ते के लिए तैयार करवाया। इस दम्पती की बीमारी भी अब पूरी तरह से ठीक हो चुकी है और उनके एक पुत्री भी है।

– इसी तर्ज पर डॉ. नगेन्द्र अब तक सात शादियां करवा चुके है। वहीं मिर्गी के कारण कई जोड़ों में तलाक की नौबत तक आ गई। डॉ. नगेन्द्र ने ऐसे लोगों की काउंसलिंग की और उन्हें साथ में रहने को प्रेरित किया। इनमें से कई जोड़े अब खुशहाल वैवाहिक जीवन गुजार रहे है।

मिर्गी पीड़िताओं के कराए आठ सौ से अधिक प्रसव

– मिर्गी रोग से पीड़ित महिलाओं के प्रसव में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इन महिलाओं के प्रसव के दौरान विशेष सावधानी की आवश्यकता रहती है। ऐसे में अमूमन चिकित्सक ऐसी महिलाओं का प्रसव कराने से इनकार कर देते थे।

– मिर्गी पीड़ित महिला की प्रसव के दौरान मौत तक हो सकती है। डॉ. नगेन्द्र ने अपने शिविर में आने वाली महिलाओं के प्रसव स्वयं के अस्पताल में निशुल्क करवाना शुरू कर दिया।

– अब तक इस अस्पताल में ऐसे करीब आठ सौ प्रसव हो चुके है। वहीं शहर के सबसे बड़े सरकारी उम्मेद अस्पताल में मिर्गी पीड़ित महिलाओं के प्रसव के लिए उन्होंने वहां पर विशेष हिदायत लिखवा दी।

– शुरुआती दौर में डॉ. नगेन्द्र स्वयं सरकारी अस्पताल में प्रसव के समय उपस्थित रहे। इसके बाद वहां के चिकित्सक भी ऐसी महिलाओं के प्रसव कराने को तैयार हो गए।

तीन सौ बच्चों को फिर से भेजा स्कूल

मिर्गी पीड़ित बच्चों के लिए स्कूल में अन्य बच्चों के साथ पढ़ने जाना अपने आप में भयावह अनुभव रहा। इस कारण तीन सौ से अधिक बच्चों को उनके अभिभावकों ने स्कूल भेजना बन्द करवा दिया। बाद में डॉ. नगेन्द्र ने ऐसे अभिभावकों से मिलकर उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजने को प्रेरित किया। अब ये बच्चे अपने स्कूलों में आराम से पढ़ रहे है। इलाज के कारण इनमें से काफी बच्चे इस बीमारी से निजात पा चुके है।

क्या है मिर्गी रोग

मिर्गी रोग मानव जीवन में ज्ञात सबसे प्राचीन बीमारी है। इसका उल्लेख भारत के पुरातन ग्रन्थों में भी मिलता है। मिर्गी कोई बीमारी नहीं है बल्कि यह शारीरिक तंत्रिकीय गड़बड़ी(न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर) की लक्षण है। मस्तिष्क की कोशिकाएं एक साथ मिलकर कार्य करती है और विद्युत संकेतों के माध्यम से परस्पर सम्पर्क करती है। कभी-कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि कोशिका समूह से असाधारण मात्रा में विद्युत प्रवाह पैदा हो जाता है। जिसकी परिणति दौरा पड़ने के रूप में होती है। इस दौरे को मिर्गी कहते है। पहले इस बीमारी के बारे में लोगों में भ्रांतियां अधिक थी। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत से इस पर शोध हुआ और इसकी दवा भी बाजार में आ गई। अब इसकी बेहतर दवा उपलब्ध है। ऐसे में असाध्य रोग मानी जाने वाले मिर्गी की बीमारी अब पूर्णतया साध्य रोग में परिवर्तित हो गई।

मरीजों के दबाव में फिर शुरू करने पड़े शिविर

डॉ. नगेन्द्र ने सौ शिविर के आयोजन के बाद इसे बन्द करने का मानस बना लिया और बाकायदा इसकी घोषणा भी कर दी, लेकिन उनके मरीज अड़ कर बैठ गए कि आप इलाज नहीं करोगे तो कौन हमारा इलाज करेगा। आखिरकार मरीजों की मांग पर उन्होंने सेवा के इस कार्य को बन्द नहीं किया। मिर्गी का इलाज करीब पांच साल तक चलता है। हर माह एक हजार से लेकर बारह सौ रुपए तक की दवा खाना जरूरी होता है।

मरीजों को दिए पहचान पत्र

अपने मरीजों को उन्होंने पहचान पत्र भी दिए। इसमें लिखा रहता है कि मैं मिर्गी रोग से पीड़ित हूं। दौरा पड़ने पर इसमें दिए चिकित्सक के नम्बर पर सूचना प्रदान की जाए। मिर्गी रोगियों को इसका दौरा कभी भी और कहीं भी आ सकता है। ऐसे मरीज चक्कर आकर नीचे गिर जाते है। कई लोग शराबी समझ कर उनकी मदद भी नहीं करते। इस तरह के परिचय पत्र देने के बाद कई लोग डॉ. नगेन्द्र को उनके मरीजों की जानकारी देते है और उनको अस्पताल तक पहुंचाते भी है।

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