कुछ वर्षों पहले तक इसे लाइलाज माना जाता था, किंतु वर्तमान में इसका इलाज संभव है। यह बात अलग है कि तपेदिक का इलाज लंबा चलता है। यह एक गंभीर रोग है जो रोगी की जान भी ले सकता है।

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कारण

सामान्यतया फेफड़ों के संक्रमण से यह रोग होता है, जिसके लिए अनुचित आहार-विहार, अपोषित व घटिया भोजन, धूम्रपान की लत तथा सीलन भरे स्थान में निवास जिम्मेदार है।

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लक्षण

इस रोग के प्रारंभ में रोगी को जुकाम होता है, फिर सूखी खांसी हो जाती है। खांसी में पहले चिकना व पतला बलगम निकलता है तथा बाद में रक्तमिश्रित कफ निकलना प्रारंभ हो जाता है। रोग लंबा खिंच जाने पर कफ में खून तथा तीव्र दुर्गंध आने लगती है। कधों व पसलियों में तेज दर्द रहता है। हाथ-पांवों में जलन होती है तथा भूख नहीं लगती। आंखें भीतर धंस जाती हैं तथा उनके किनारों पर काले घेरे पड़ जाते हैं। प्राय: हर समय 98 से 103″ तक बुखार बना रहता है। पेशाब में चिकनाई आने लगती है। रात्रि के समय अधिक पसीना आता है तथा पूरा शरीर सूखकर कांटा हो जाता है।

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उपचार

मुनक्का

500 ग्राम दूध में छोटी पिप्पली और तीन-चार मुनक्का डालकर उबाले व उस दूध को पीएं। इस दूध को पीने से पूर्व लहसुन की 2-3 कलियां छीलकर खाएं तो ज्यादा लाभ होगा।

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अंगूर

अंगूर तपेदिक के रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद फल है। यह फेफड़ों को बल देता है| इसके नियमित सेवन से तपेदिक जल्दी ठीक हो जाता है |

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अखरोट

दो-तीन अखरोट की गिरी के साथ लहसुन की दो-तीन कलियां चबाकर खाने से या फिर इन्हें घी में भूनकर सेवन करने से तपेदिक के रोगी को शक्ति मिलती है।

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खजूर

लगभग 500 ग्राम दूध में छह-सात खजूर उबालकर खाने से क्षय रोगियों को लाभ होता है। लेकिन यह प्रयोग सर्दियों में ही करें।

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गाजर

तपेदिक के रोगी को नित्य एक गिलास गाजर का रस पीना चाहिए। इससे काफी लाभ होता है।

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नारियल

तपेदिक के रोगी को नित्य 30 ग्राम कच्चा नारियल खिलाने से वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है। नारियल में तपेदिक के कीटाणुओं को मारने की क्षमता होती है तथा यह फेफड़ों को भी बल देता है।

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केला

क्षय रोग में कच्चे केले की सब्जी बनाकर खाने से विशेष लाभ होता है। केले के पेड़ का रस भी क्षय रोग में उपयोगी होता है। क्षय रोग में यदि रोगी की हालत गंभीर हो तो उस समय उसे थोड़ा-थोड़ा करके केले का रस पिलाना चाहिए। इससे उसके फेफड़ों से बलगम आसानी से निकलने लगेगी। केले के पत्तों का रस शहद में मिलाकर रोगी को पिलाते रहने से भी उसके फेफड़ों के घाव भर जाते हैं व फेफड़ों से खून आना बंद हो जाता है। दो माह तक केले द्वारा यह उपचार कर लिया जाए तो रोगी ठीक हो जाता है।

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आम

आम के रस में शहद मिलाकर प्रात: तथा सायंकाल प्रयोग करने से तपेदिक के रोगी को काफी राहत मिलती है। यहां उल्लेखनीय है कि यदि आम के रस के साथ दूध में पिप्पली उबालकर रोगी को पिलाई जाए तो उसे दोहरा लाभ होता है। इसी प्रकार आम के रस के साथ लहसुन की 2-3 कलियां छीलकर दूध में उबालकर पी जाएं तो भी जल्दी लाभ होता है।

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बेल

बेल की 200 ग्राम कचरियां या सूखी गिरी एक किलो पानी में पकाएं। जब 50-60 ग्राम पानी बच जाए तो इसमें दो किलो मिश्री डालकर एक तार की चाशनी बना लें। इसमें थोड़ा केसर व जावित्री की सुगंध भी डाल दें। इस नुस्खे की पांच ग्राम खुराक दिन में चार बार सेवन करें। उपरोक्त उपचार के एक सप्ताह बाद बेल की जड़ का गूदा, नागफनी और थूहर के पके पत्ते 20-20 ग्राम मात्रा में, 15 ग्राम अडूसा, दो-दो ग्राम पिप्पली व काली मिर्च को पीसकर आधा किलो पानी में पका लें। जब 60-70 ग्राम पानी बचे तब इसे छानकर शहद में मिलाकर रख लें और सुबह-शाम चाटते रहें। तपेदिक कुछ ही माह में समाप्त हो जाएगा।

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सेब

तपेदिक के रोगियों के लिए सेब विशेष संरक्षण देने वाला फल है। इस रोग में  सेब का नियमित सेवन करना चाहिए।

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नीबू

तपेदिक के रोगी को यदि लगातार ज्वर रहता हो तो उसे 11 पत्ती तुलसी, जीरा, हींग व नमक (स्वादानुसार) तथा 25 ग्राम नीबू का रस गर्म पानी में मिलाकर दिन में तीन बार पीना चाहिए। ज्वर उतर जाएगा।

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